बड़े दिल से हमारा मध्यमवर्गीय वर्ग अपने लिए सपने बुनता है, कभी शादी के सपने, कभी परिवार के, कभी घर के और कभी अपने देश के. मुद्दत से सोया वर्ग अपने साथ देश को ले उठा और बनाने की कोशिश की अपने देश की तक़दीर. क्योंकि देश बदलेगा तो अपनी खुद की तक़दीर बदलेगी. पर लगता है फिर उसके मुकद्दर में कुछ खास आया नहीं. पहले आसमान छूती महंगाई की मार से बचने का सपना टूटा. मियां यहाँ न तो महंगाई दर चलती है न ही जीडीपी, यहाँ चलता है आटे-दाल का भाव. क्या किसी को कम भाव में गेहूं-चावल मिला बाजार में. पहले पूरे सीजन में अपने भाव खोती मटर इस पूरे सीजन में 40 रुपये किलो के सिंहासन पर जो बैठी तो नीचे उतरने का नाम ही नहीं ली. हमेशा की तरह संतोषी जीव; सोचा की, चलो जी इस निगोड़ी महंगाई से इनकम टैक्स में जो राहत मिलने वाली है उसमे एडजस्ट कर लेंगे. फिर आया जी बजट बड़ी उम्मीदों का पिटारा लिए. मीडिया रिपोर्ट्स में आ रहा था की, बड़ी सी राहत, हर सेक्टर में. तो जी बजट आया, लाया बढ़ता सेंसेक्स. क्या? कुछ लोग तो सेंसेक्स भी नहीं समझते भाई जान. तो जी सेंसेक्स होता है, बड़े लोगों का बड़ा खेल. ट्रेड पंडित उछल-उछल के इसे बाजार का बजट बता रहे थे. कॉर्पोरेट हाउसेस में दिवाली मन गयी और फिर एक बार मध्यमवर्गीय वर्ग ठगा सा महसूस कर रहा था, उसे बताया गया की, उसे तो खुद केयर करना है. जी देश की बात है तो वो बेचारा यह भी करेगा जी, क्यों नहीं करेगा आखिर इसकी सारी आय तो वेतन से है, बस उस बेचारे की समझ में यह नहीं आता की पूरे देश में बस उसी की आय क्यों पूरी तरह से खाते में आती है बाकि जो मर्जी हो बताये मान ली जाती है. अब इसे तो अपनी आय में से खर्चे घटाने की भी परमिशन नहीं है, उसे बताया गया है की यदि टैक्स से बचना है तो बचत करो. अरे कोई बताओ भैया बचा-बचा के तो वो टैक्स भरता है, और कहाँ से बचाये. गिरते पड़ते कोमा से बाहर आ रहा था कि डीज़ल-पेट्रोल के भाव बढ़ गए और बढे सर्विस टैक्स के साथ जुड़ के उसकी आमद की जो गत बनेगी यह सोच उसे गश आ रहे हैं. सारी विपदा के बाद भी बगुले की तरह आँखे मूंदे इसी आशा में वो आगे बढ़ा की चलो जी कोई बात नहीं, देश की बात है करना पड़ेगा. तो फिर उसे पता चलता है की देश के गद्दार खुले घूमने वाले हैं. क्या? क्या? क्या? अब बस यही बात घूम रही है उसके दिमाग में .
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